मम्मो (१९९४)
ये फ़ासलें तेरी गलियों के हमसे तय न हुवे,
हज़ार बार रुकें हम, हज़ार बार चलें
ना जाने कौनसी मट्टी वतन की मट्टी थी,
नज़र में धूल, जिगर में लिए ग़ुबार चलें
ये कैसी सरहदें उलझी हुवीं है पैरों में,
हम अपने घर की तरफ उठके बार बार चलें
न रास्ता कहीं ठहरा, न मंज़िलें ठहरीं,
ये उम्र उड़ती हुई गर्द में गुज़ार चलें
सम्पूरण सिंह 'गुलज़ार'
I don't know why it's not coming out properly
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